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इन विरोधाभासों के बाद भी अगर कोई बजट को विकासोन्मुखी बताता है तो मैं उसके लिए एक ही शब्द का इस्तेमाल करूंगा- सरकारी दलाल

इन विरोधाभासों के बाद भी अगर कोई बजट को विकासोन्मुखी बताता है तो मैं उसके लिए एक ही शब्द का इस्तेमाल करूंगा- सरकारी दलाल



सौमित्र रॉय 

इस साल का बजट मतलब दीनदयाल देश बेचो बहीखाता है। लेकिन वित्त मंत्री ने देश के 1 प्रतिशत अमीरों (जिनके पास देश के 85 फीसदी से भी ज्यादा संसाधन हैं) के लिए बजट पेश करते हुए आने वाले समय में जीडीपी ग्रोथ के जो लब्बो-लुआब दिखाए हैं, उनका भंडाफोड़ करना जरूरी है। 

1. सबसे पहली बात तो यह कि मोदी सरकार ने बीते 36 महीने में बाजार से 10.5 लाख करोड़ रुपए उधार लिए हैं। कोविड महामारी में सरकार को 5 लाख करोड़ के राजस्व का नुकसान हुआ है। सरकार ने आत्मनिर्भर भारत के रूप में प्रोत्साहन पैकेज के बतौर केवल 1.5 लाख करोड़ रुपए पूंजीगत खाते से खर्च किए हैं (यहां 5.5 लाख करोड़ रुपए खर्च करने की बात झूठ है)। 

2. वित्त मंत्री ने इस साल यानी 2021-22 में 6.8 फीसदी जीडीपी ग्रोथ की उम्मीद जताई है। 2025-26 तक सरकार को वापस 4.5 फीसदी की जीडीपी ग्रोथ की उम्मीद है। यानी मोदी जब 2024 का चुनाव लड़ेंगे तो वे यह दावा नहीं कर सकते कि देश की आर्थिक स्थिति सुधरी है, क्योंकि पिछली 8 तिमाहियों में देश की जीडीपी 8 से 4 फीसदी पर लुढ़की है। इसका मतलब यह भी है कि खुद सरकार इस बात को मान रही है कि अगले 4 साल में जीडीपी केवल 0.5 फीसदी तक ही बढ़ सकेगी। 

3. सबसे खतरनाक बात यह है कि मोदी सरकार के पास पैसा नहीं है और वह उधारी पर चल रही है। मोतीलाल ओसवाल फायनेंशियल सर्विसेज के अर्थशास्त्रियों ने हाल की एक रिपोर्ट में साफ कर दिया है कि सरकार का उधारी और जीडीपी का अनुपात 1981 के बाद सबसे उच्च स्तर पर यानी 91 फीसदी है। इसे 40 फीसदी होना चाहिए, लेकिन 2040 तक ऐसा होने की उम्मीद नहीं है। वित्त मंत्री को भी नीचे का लिंक पढ़ना चाहिए, क्योंकि जवाब उन्हें ही देना है।

4. सरकार का उधारी और जीडीपी का सबसे अधिक अनुपात आने वाले दिनों में भयानक आर्थिक संकट के रूप में दिखेगा। इस साल सरकार देश के तमाम सार्वजनिक प्रतिष्ठानों को बेचने वाली है, क्योंकि पैसा चाहिए। सरकार को यह बताना होगा कि अगले 2 साल बाद क्या होगा, जब बेचने को कुछ भी नहीं बचा होगा। फिर क्या सरकार देश के राज्यों को गिरवी रखेगी ? 

5. महज 1.5 लाख करोड़ के पूंजीगत खर्च से नौकरियां पैदा नहीं होने वालीं। यह दिख भी रहा है। भारत की 50 करोड़ की कामगार आबादी में हर साल करीब 1.5 करोड़ लोग जुड़ जाते हैं। CMIE के अनुसार जनवरी 2021 में बेरोजगारी की दर 6.5 प्रतिशत है, लेकिन शहरों में यह 8 प्रतिशत और गांवों में 6 फीसदी है। कुल 10 करोड़ लोग अभी बेरोजगार हैं। नौकरी नहीं तो खर्च नहीं और सरकार को टैक्स के रूप में मिलने वाला राजस्व भी कम रहता है। वित्त मंत्री अगर यह साधारण का गणित भी नहीं जानतीं तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए। 

6. बाजार से उधारी लगातार बढ़ने के कारण सरकार के पूंजीगत खर्च पर असर पड़ता है और यह देश के विकास और गरीबों पर खर्च में लगातार कटौती के रूप में इस बजट में सबसे ज्यादा दिखा है। (ग्राफ देखिए) मोदी सरकार ने गरीबों की गिनती ही बंद कर रखी है, सो उसके द्वारा गरीबों के सहायता के दावों में कोई सच्चाई नहीं है। 

7. पिछले साल मोदी सरकार ने सामाजिक क्षेत्र (स्कूल, अस्पताल) बनाने में -38.2 पूंजीगत खर्च किया, यानी शून्य से भी कम। ज्यादा काम ढांचागत परियोजनाओं में हुआ, जिसका फायदा बड़ी कंपनियों को मिला है। इस बार का अनुमान 89 फीसदी खर्च सामाजिक क्षेत्र में करने का है। 

8. 9.5 फीसदी वित्तीय घाटे ने सरकार के हाथ खींचे हैं। बजट से पहले सरकार के पास सामाजिक क्षेत्र में अतिरिक्त खर्च करने के लिए करीब 4 लाख करोड़ रुपए ही थे। इसमें से 3 लाख करोड़ खाद्य सब्सिडी में, 50 हजार करोड़ मनरेगा (ज्यादा आवंटन) और 38 हजार करोड़ रेल्वे को कोविड लोन और 28500 करोड़ जन-धन खाते में जाएंगे। 

9. 2020 में मोदी सरकार ने 22.8 लाख करोड़ रुपए ही खर्च किए, जबकि बजट अनुमान 34.4 लाख करोड़ का था। अब मार्च 2021 तक उसे 11.8 लाख करोड़ खर्च करने होंगे। यह नामुमकिन है। फिर भी वित्त मंत्री ने किसान कल्याण योजना में 100 अरब, मनरेगा में 370 अरब, एकीकृत बाल विकास, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना और राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम के बजट में भारी कटौती कर यह बता दिया है कि गरीब, बेसहारों, वंचितों के लिए उसके मन में कोई दर्द नहीं है। 

10. किसानों के लिए पिछले बजट में 1.54 लाख करोड़ कृषि के लिए आवंटित थे, जिसे घटाकर 1.48 लाख करोड़ कर दिया गया है। किसानों को एमएसपी की गारंटी दो योजनाओं से मिलती है। एक है पीएम आशा, जो 2018 में शुरू हुई। इसका बजट 15 अरब से घटकर 4 अरब पर आ गया है। मूल्य वृद्धि को रोकने के लिए सरकार का बाजार में हस्तक्षेप की योजना का बजट 30 अरब से अब 15 अरब पर आ चुका है। 

इन विरोधाभासों के बाद भी अगर कोई बजट को विकासोन्मुखी बताता है तो मैं उसके लिए एक ही शब्द का इस्तेमाल करूंगा- सरकारी दलाल।



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METOO: इन विरोधाभासों के बाद भी अगर कोई बजट को विकासोन्मुखी बताता है तो मैं उसके लिए एक ही शब्द का इस्तेमाल करूंगा- सरकारी दलाल
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