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आखिर में बचता है कानून, जिसकी आंखों में खुद पट्टी बंधी है?

आखिर में बचता है कानून, जिसकी आंखों में खुद पट्टी बंधी है?



सौमित्र रॉय 

भारत यानी आर्यावर्त में यह हो क्या रहा है ? दुर्योधन की अगुवाई में कौरवों की मनमानी पर दृष्टिहीन धृतराष्ट्र यह सवाल अक्सर पूछते रहते थे। भारत में सबसे ऊंचे संवैधानिक ओहदे पर काबिज धृतराष्ट्र दृष्टिहीन नहीं है, लेकिन गांधारी की तरह उन्होंने अपनी आंखों पर उस ममता की पट्टी बांध रखी है, जो 100 बेटों को उसकी आड़ में हर गलत कदम उठाने की सहूलियत देती है। बाकी 90 फीसदी अवाम ने भी आंखों में वैसी ही लाड़ वाली पट्टी बांध रखी है और सब-कुछ समझकर भी चुप रहने का विकल्प उन्हें ठीक लगता है। 

मेरे जैसे जो बोल रहे हैं, उनका क्या? उनके लिए कौरवों ने दिल्ली से लेकर देहरादून और उत्तराखंड के गांव तक चप्पे-चप्पे पर ऐसे राष्ट्रप्रेमी तैनात कर रखे हैं, जो बोलने वालों को पकड़े, उनकी देश विरोधी के रूप में ब्रांडिंग करे और पूरी व्यवस्था से अलग कर दे। 

ताजा मामला उत्तराखंड का है। राज्य के डीजीपी बड़ी बेशर्मी से कह रहे हैं कि पासपोर्ट कानून में देशविरोधी गतिविधियों में लिप्त व्यक्ति को पासपोर्ट न देने का प्रावधान है। इसलिए आवेदक के सोशल मीडिया अकाउंट की पड़ताल होगी। लेकिन देशविरोधी गतिविधि क्या है ? इसका निर्धारण कौन, किस आधार पर करेगा? 

नरेंद्र मोदी की सरकार ने इसका ठेका तो गली के हवलदार तक को दे रखा है। आखिर में बचता है कानून, जिसकी आंखों में खुद पट्टी बंधी है। सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि सरकार के काम की आलोचना देश द्रोह नहीं है। 

फिर भी उत्तराखंड की पुलिस पासपोर्ट मांगने वाले के सोशल मीडिया अकाउंट को खंगालकर उसके देशप्रेम का निर्धारण करेगी। कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी को बेल के लिए एक महीने जेल में रहना पड़ा, क्योंकि छोटे जज साहेब की राय उनके देशप्रेम को लेकर अलग थी। 

यानी अगर आपकी राय नरेंद्र मोदी की बीजेपी सरकार से नहीं मिलती तो आपको व्यापक समाज,  व्यवस्था और तंत्र से बाहर खदेड़ दिया जाएगा। आखिर में आपके लिए इंसाफ का सबसे बड़ा घंटा ही बचेगा, जिस तक पहुंचना सबके बस में नहीं। 

ग्रेटा थनबर्ग और मिया खलीफा से लेकर लुसिप्रिया कंजुगम तक ने इसी पर चिंता जताई कि भारत सरकार की नाइंसाफी का लोकतांत्रिक विरोध करने वालों की आवाज दबाई जा रही है। इस पर बीजेपी के भक्तों की सुलग पड़ी। 

दरअसल, मोदी सरकार चाहती है कि इस तरह का तमाशा देशभर में लगातार होता रहे। मुल्क सहमत और असहमत, देशप्रेमी और देशविरोधी, अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक में बंटा रहे। 

इसकी आड़ में मोदी सरकार को अपनी नाकामियों पर परदा डालने में आसानी होती है, क्योंकि मूर्ख अवाम गोदी मीडिया के दुष्प्रचार और बहकावे में आकर संघियों के इशारों पर नाचती है और बाकी मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। 

दूसरी ओर सड़क पर खुलेआम तते, कानून तोड़ते, दंगा फैलाने की साजिश रचते लोग सरकार की नजर में अक्सर देशप्रेमी होते हैं, क्योंकि वे नफरती विचारधारा के समर्थक हैं। 

बड़ा सवाल यह है कि बीजेपी और आरएसएस मिलकर जिस नए भारत को गढ़ रहे हैं, उसका भविष्य क्या है ? सत्ता जब हर मुद्दे को बांटकर देखती है तो वह बेहद कमजोर हो जाती है। दुनिया की तमाम बड़ी ताकतों को यह बात समझ आ चुकी है। 

दुनिया को यह भी समझ आ चुका है कि भारतीय गणराज्य की लगाम एक निरंकुश, अनुभवहीन, निष्ठुर और तानाशाही सोच वाली सरकार के हाथ में है। यह इस कदर कमजोर है कि एक 18 साल की लड़की की चुनौती पर बिलबिला जाती है और बिना नाम लिए उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर देती है। 

अपने चारों ओर नजर उठाकर देखें। भारत की सरहद पर चीनी टैंक, मिसाइलें और लड़ाकू विमान खड़े हैं। पड़ोसी देशों की नजर भारत के प्रति अच्छी नहीं है। सरकार के पास अपनी अवाम की भूख मिटाने और बेहतरी के लिए पैसा नहीं है। लोगों के पास नौकरी नहीं है, काम नहीं है। महंगाई कमर तोड़ रही है। 

फिर भी राष्ट्रगौरव की अफीम में 90 फीसदी जनता सरकार की हां में हां मिला रही है, सिर्फ इसलिए क्योंकि वह खुद को मजहबी तौर पर श्रेष्ठ मानती है। ऐसा करने से अवाम को सत्ता का संरक्षण मिलने की उम्मीद है। हर गलत काम के लिए, जिसे सत्ता सही ठहराएगी। 

उनके लिए यह बहुत सुविधाजनक स्थिति है। वे जेल नहीं जाएंगे। पत्नी के साथ शादी की 50वीं सालगिरह की तस्वीर डाल सकेंगे। बच्चों की शादी से लेकर अपनी मैयत तक में उस जमात के लोगों की भीड़ जुटा लेंगे, जो उनकी तरह सहमत हैं। फिर भी ठहरिए। सोचिए कि जब हम जैसे 10 फीसदी असहमत लोगों को ठिकाने लगा दिया जाएगा तो फिर नंबर आपका भी आएगा।



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आखिर में बचता है कानून, जिसकी आंखों में खुद पट्टी बंधी है?
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