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बनिए की दुकान वाले मीडिया को गाली देना बंद करिए, उनको चौथा खंभा कहके सिर पर आपने ही चढ़ाया था

बनिए की दुकान वाले मीडिया को गाली देना बंद करिए, उनको चौथा खंभा कहके सिर पर आपने ही चढ़ाया था


Nadim S. Akhter 

किसानों की चिंता मत करिए। ये खुद अपना किया भुगतेंगे। देश में जो काम इन्होंने मिलकर किया है, वो सूद समेत इनको वापस तो मिलेगा ही। ये प्रकृति का नियम है। दूर से कहा है, नजदीक से समझिएगा। 

रही मेनस्ट्रीम मीडिया की बात तो ये दुनिया का गंवार और अनपढ़ आदमी भी जानता है कि बनिया जब बिजनेस करने के लिए दुकान खोलेगा, तो दुकान में असली-नकली माल अपने फायदे के हिसाब से बेचेगा। वह समाजसेवा और देशसेवा के लिए दुकान नहीं खोल रहा होता है। उसके दुकान में काम करने वाले सब नौकर होते हैं, जिसे किसी भी दिन कहा जा सकता है कि कल से मत अइयो। हिसाब कर ले अपना! 

बनिए के बारे में ये बेसिक समझ और कॉमन सेंस हर आदमी में होती है। सो मुझे आश्चर्य है कि मेनस्ट्रीम मीडिया के नाम पर देश में खुली बनियों की नाना-दादा प्रकार की दुकानों को भाई लोग अब तक लोकतंत्र का चौथा खंभा और पत्रकारिता जैसे नामों से क्यों सुशोभित करते आ रहे थे ? बनिए कब से लोकतंत्र का चौथा खंभा बन गए, उनका उद्देश्य तो बिजनेस करके मुनाफा कूटना होता है, बस। इसलिए बनिए की दुकान वाले मीडिया को गाली देना बंद करिए। उनको चौथा खंभा कहके सिर पर आपने ही चढ़ाया था। वे किसी के नहीं हैं। जिसकी सत्ता होगी, वे उसी की चाकरी करेंगे। वे व्यापारी हैं, व्यापार करना जानते हैं।

रही बात सोशल मीडिया, खासकर यूट्यूब के माध्यम से स्वतंत्र पत्रकारिता कर रहे घुटे हुए पत्रकारों की तो इनमें से ज्यादातर वे हैं, जो या तो रिटायर हो चुके हैं या फिर जिनको मेनस्ट्रीम मीडिया में नाना-दादा-अन्यान्य कारणों से नौकरी नहीं मिल सकती। सो उन्होंने अपना यूट्यूब चैनल खोलकर खुद की दुकान चमकाने का एक अलग रास्ता चुना। अगर इनको नौैकरी मिल गई होती, तो ये भी अपने बनिए की दुकान पर लाला के हिसाब से चुपचाप पत्रकारिता कर रहे होते और मोटी तनख्वाह घर ले जा रहे होते। अब यूट्यूब पर अपनी दुकान सजाने में लगे हैं।

एक मित्र को बड़े मीडिया संस्थान से बहुत अच्छा ऑफर आया। उनका स्ट्रगल मैंने बहुत नजदीक से देखा है। रात में छत पर चारपाई पर बैठकर बातें की हैं। उनको जो काम मिला, वो उनके मिजाज को सूट नहीं करता था। उन्होंने जॉइन कर तो लिया, पर असमंजस में थे कि continue करें या ना करें। उन्होंने मुझे फोन किया कि क्या करें ? मुझे बड़ा भाई मानते हैं। मैंने उनको समझाया कि जब आप स्ट्रगल कर रहे थे और रोटी की चिंता थी, तो कौन समाज आपकी मदद को आया ? 

शर्म से तो आप दुनिया को बता भी नहीं सकते कि आपकी हालत क्या है ? सो इस देश में जब पत्रकारों की कोई सोशल सिक्युरिटी नहीं है, उन्हें सरकारें भी खदेड़ती हैं, उनका मीडिया संस्थान भी उन्हें दिहाड़ी का नौकर समझता है और गले तक भ्रष्टाचार में डूबा हमारा समाज उनसे पेट-जीवन स्तर की चिंता किए बगैर ईमानदार पत्रकारिता की उम्मीद रखता है, तो उस देश में पत्रकारों को क्या करना चाहिए ? जाहिर है, बाल-बच्चों और परिवार की चिंता करिए। शान से नौकरी करिए। अपना जीवन ठीक करिए। Survival of the fittest. जो पत्रकार तथाकथित क्रांति कर रहे होते  हैं, या तो वे आर्थिक रूप से बहुत सम्पन्न होते हैं या अपने कैरियर में उन्होंने इतना माल कूट लिया होता है कि कम से कम परिवार और रोटी की चिंता उनको नहीं होती। उनके पास आर्थिक सुरक्षा होती है।

एक वरिष्ठ पत्रकार और देश के प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर रहे सज्जन जब अखबार में थे, तो उन्होंने सम्पादकीय पेज पर मेरे कैरियर का पहला लेख छापा था। तब तक मैं मेनस्ट्रीम मीडिया में नौकरी नहीं पा सका था। लेख छपने के बाद जब मैं धन्यवाद देने उनके दफ्तर गया तो उन्होंने पहला सवाल मुझसे पूछा कि घर पर खेती-बाड़ी या आमदनी का कोई जरिया है या सिर्फ सूखी पत्रकारिता करने दिल्ली आए हो ? हमने कहा कि नहीं, खेती-वेती तो है नहीं अपने पास और आय का कोई जरिया भी नहीं। पत्रकारिता से ही रोटी कमानी है। वो जोर से हंसे। बोले- अभी नए हो, धीरे-धीरे समझ जाओगे कि पत्रकारिता रईसों के बच्चों का शगल है। लिखो-पढ़ो लेकिन आमदनी का कोई अलग जरिया जरूर बना लो।

तब उनकी बात समझ नहीं आई थी। बाद में जब पत्रकारिता में गहरे घुसा, तो समझ गया कि वे क्या कहना चाह रहे थे। मैं आज भी उनके सम्पर्क में हूं और जरूरी मामलों में उनसे सलाह जरूर लेता हूं।



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