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देशद्रोह क्या है? सरकारों की नीतियों का विरोध देशद्रोह है!

देशद्रोह क्या है? सरकारों की नीतियों का विरोध देशद्रोह है!



शादाब सलीम

सरकारों का विरोध करना देशद्रोह नहीं है, सरकारों के विरुद्ध असहमति भारत के विरुद्ध असहमति नहीं होती। इसमे कोई दो राय नहीं कि भारत संप्रभु शक्ति है और भारत से सर्वोच्च कुछ नहीं है पर राजनीतिक दल सर्वोच्च नहीं है। राजनीतिक दलों से ही भारत की सरकार बनती है और सरकार के प्रति असहमति ज़ाहिर करने को भारत के विरुद्ध असहमति करार दे दिया जाता है। यह कितना खतरनाक है, एक तरह से सरकारों को निरंकुश शक्ति है जहां वे अपने विरुद्ध आने वाली हर आवाज़ को देशद्रोह के बुलडोजर के नीचे दबा देतें है। यह एक स्वस्थ समाज के निर्माण और वैचारिक मतभिन्नता के अधिकार पर आघात है।

हाल ही में पर्यावरणविद दिशा रवि, शशि थरूर और राजदीप सरदेसाई जैसे लोगों को एक ट्वीट के आधार पर देशद्रोह का आरोपी बनाया जाना अत्यंत भयावह है। भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए पर उच्चतम न्यायालय को तत्काल संज्ञान लेकर देशद्रोह की स्पष्ट परिभाषा प्रस्तुत करनी चाहिए क्योंकि सत्ता में बैठी सरकारें दंड संहिता की इस धारा का अत्यंत बेमतलब का अर्थ निकाल रहीं हैं।

जो आवाज़ सत्ता के विरुद्ध आती है उस आवाज़ को भारत के विरुद्ध घोषित कर दिए जाने की परंपरा सी बनकर उभरी है। भारत का सम्मान, उसकी सर्वोच्चता और उसकी संप्रभुता उसके संविधान में निहित है पर इसके अर्थ ऐसे कर दिए गए हैं कि भारत की सर्वोच्चता शासन करने वाले राजनीतिक दलों में निहित है। यह कितना ख़तरनाक है जहां संविधान के मूल आदर्शो को तिलांजलि देकर राजनीतिक दलों के आदर्शों को सर्वोच्च माना जा रहा है अर्थात राजनीतिक दल संविधान की प्रस्तावना से भी सर्वोच्च हो चलें हैं, यह विधि शासन के बुनियादी पत्थर को हिलाने जैसा है।

जब देश के नामवर लोगों को देशद्रोह में सरकारों द्वारा फंसाया जा सकता है तो आमजन तो सरकारों की नीतियों के विरुद्ध उफ्फ तक नहीं कर सकता है। पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि को दिल्ली पुलिस ने बेंगलुरु से गिरफ्तार किया और दिल्ली की अदालत में उन्हें पेश किया गया। उन्हें गिरफ्तार करने के बाद 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए जाने के सांविधानिक प्रावधान की भी अवहेलना की गई। उन्हें एक ट्वीट आधार पर सांप्रदायिक द्वेष फैलाने और भारत से असहमति के आरोपो में गिरफ्तार किया गया है।

आम जन मानस सरकारों की कहाँ तक आलोचना कर सकता है और कहां तक सत्ता में बैठें दलों की नीतियों का विरोध किया जा सकता है इस पर उच्चतम न्यायालय द्वारा स्पष्ट दिशा निर्देश आने चाहिए जिससे अवैध रूप से गिरफ्तारियों से लोगों को बचाया जा सकें और स्वस्थ आलोचना के रास्ते खुले रहें जिससे सरकारें निरंकुश स्थिति में नहीं आए।

जो भारत बोलने की स्वतंत्रता दे रहा है व्यक्ति उस ही भारत की संप्रभुता के विरुद्ध आखिर क्यों विद्रोह करेंगे! भारत से असहमति के तो प्रश्न ही नहीं आतें हैं असल असहमति तो राजनीतिक दलों से हो सकती है और होती भी है क्योंकि एक जैसा सोचना कहीं भी मनुष्यों के लिए संभव ही नहीं है। नेचर के नियम में कोई भी एक जैसा पैदा नहीं किया जाता। वैचारिक भिन्नता संभव है पर ऐसी भिन्नता भारत की सर्वोच्चता के लिए ख़तरा नहीं होना चाहिए।

देशद्रोह क्या है? यह इस समय का अत्यंत ज्वलंत प्रश्न है। इसकी विस्तृत और सरल परिभाषा नितांत आवश्यक है जिससे पुलिस मुकदमा बनाते समय इस परिभाषा और व्यक्ति के किए गए कृत्य का अच्छे से अवलोकन कर सकें। ऐसी स्थिति निर्मित नहीं हो कि राजनीतिक दल की नीतियों के विरोध को देशद्रोह बना दिया जाए।


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देशद्रोह क्या है? सरकारों की नीतियों का विरोध देशद्रोह है!
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